बस्तर दशहरा: राष्ट्रपति मुर्मु ने की अनूठी परंपराओं की सराहना, कहा- मुरिया दरबार जमीनी लोकतंत्र का उत्कृष्ट उदाहरण
जगदलपुर: राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर की आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी की पावन भूमि जगदलपुर में आयोजित विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में शिरकत की। इस अवसर पर उन्होंने बस्तर दशहरा की विशिष्ट धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं की सराहना करते हुए इसे छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव, सामूहिक आस्था, सामाजिक समरसता और जनजातीय विरासत का जीवंत प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह अनूठा उत्सव विभिन्न समुदायों को एक सूत्र में पिरोता है।
राष्ट्रपति ने माँ दंतेश्वरी को नमन करते हुए कहा कि इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जनभागीदारी है। रथ निर्माण से लेकर रथ खींचने और विभिन्न अनुष्ठानों तक हर समुदाय अपनी परंपरागत जिम्मेदारी निभाता है, जो सामाजिक एकता और आपसी सहयोग का असाधारण उदाहरण है।
मुरिया दरबार: जमीनी लोकतंत्र का जीवंत रूप
मुरिया दरबार की परंपरा का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु ने इसे जमीनी स्तर की लोकतांत्रिक व्यवस्था का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इस मंच पर समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर जनसमस्याओं और सामाजिक विषयों पर विचार-विमर्श करते हैं। ऐसी परंपराएं भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत करती हैं।
उन्होंने लगभग दो माह पूर्व राष्ट्रपति भवन में बस्तर के प्रतिनिधिमंडल (बस्तर पंडुम के विजेताओं, परगना मांझी और चालकी) से हुई मुलाकात का भी स्मरण किया और कहा कि ऐसे आयोजन जनजातीय युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं।
युवाओं को अवसर और नक्सलवाद से मुक्ति का उल्लेख
राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समाज में अपार प्रतिभाएं हैं। उचित अवसर मिलने पर यहां के युवा देश का गौरव बढ़ा सकते हैं। उन्होंने बस्तर ओलंपिक में युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी की सराहना करते हुए विश्वास जताया कि भविष्य में यहां के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाएंगे।
इसके साथ ही, उन्होंने छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की समस्या से मुक्ति और सुरक्षा-विकास के क्षेत्र में आ रहे सकारात्मक बदलावों के लिए केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों की सराहना की।
प्रकृति संरक्षण और विकास का संदेश
राष्ट्रपति ने जनजातीय जीवन दर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण इस समाज की विशिष्ट पहचान है। उन्होंने सभी नागरिकों से अधिक से अधिक पौधे लगाने का आह्वान किया। साथ ही यह विश्वास जताया कि वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में जनजातीय समाज की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने भी रखे विचार
कार्यक्रम में राज्यपाल श्री रमेन डेका ने कहा कि बस्तर दशहरा समाज को साथ लेकर चलने की सीख देता है और संवाद ही हर समस्या का समाधान है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए कहा कि बस्तर दशहरा बस्तर की लोक संस्कृति का आईना है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष यह उत्सव इसलिए भी विशेष है क्योंकि बस्तर हिंसक माओवाद से मुक्त होकर नवनिर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। नियद नेल्लानार योजना, आधारभूत विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उठाए जा रहे कदमों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बस्तर को देश का अग्रणी संभाग बनाने के प्रयास लगातार जारी हैं।
इस अवसर पर संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल, जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में पारंपरिक मांझी-चालकी, गणमान्य नागरिक व श्रद्धालु उपस्थित रहे।