रायपुर / छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ का प्रमुख लोक पर्व हलषष्ठी (जिसे स्थानीय भाषा में कमरछठ भी कहा जाता है) प्रदेशभर में भक्ति और पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया । भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है।
भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में मान्यता धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम का जन्म हुआ था। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और मूसल है, इसलिए उन्हें ‘हलधर’ भी कहा जाता है। इस दिन हल की पूजा का विशेष महत्व है।
कमरछठ व्रत के विशेष नियम व परंपराएं:
- हल से जुते अन्न का त्याग: इस व्रत में हल से जोतकर उगाए गए किसी भी अनाज या सब्जी का सेवन नहीं किया जाता है।
- पसही चावल और भाजी का भोग: व्रती महिलाएं इस दिन बिना जोती हुई जमीन या तालाब-पोखरों में उगने वाले पसही (तिन्नी) के चावल और बिना हल के उगाई गई छह प्रकार की भाजियों का सेवन करती हैं।
- भैंस के दूध का उपयोग: हलषष्ठी में गाय के दूध या उससे बनी चीजों का उपयोग पूरी तरह वर्जित रहता है; केवल भैंस के दूध, दही और घी का ही प्रयोग किया जाता है।

सगरी बनाकर हुई सामूहिक पूजा छत्तीसगढ़ के गांवों और शहरों में महिलाओं ने एक साथ मिलकर मिट्टी या तालाब के रूप में ‘सगरी’ बनाई। सगरी में महुआ की डाली, कांस और बेरी की टहनियां रोपकर षष्ठी माता, भगवान शिव-पार्वती और बलराम जी की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। महिलाओं ने कथा सुनकर अपने बच्चों की सुख-समृद्धि और सुरक्षा की प्रार्थना की।
पूजा-अर्चना के बाद माताओं ने महुआ के पत्तों पर पसही चावल का प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत पूर्ण किया।